स्त्री: एक चुनौतीपूर्ण जीवन
भारतीय नवजागरण और उसके बाद फेमिनिज्म का स्वर इस प्रकार रही है।
"संसार का विस्तार स्त्री के शोषण और पुरूष के वर्चस्व पर आधारित है। भारत में भी पितृसत्तात्मक समाज है। इस पितृसत्तात्मक समाज में धर्म, वर्ग, जाति और वर्ण के आधार पर स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी माना जाता रहा है इसलिए स्त्री असमानता का मूल स्त्रोत समाज ही है। भारतीय स्त्री के संदर्भ में यह बात प्रचलित है कि वह अपने भावों, विचारों, आकांक्षाओं को तर्कों से नहीं सोचती। पुरूष प्रधान समाज में परवरिश होने के कारण स्त्री हर क्षेत्र में पुरूष के पीछे ही चलती रहती है। भारत में अधिकांश स्त्री समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाकर अस्तित्वहीन जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।"
हालांकि आज हमारे समाज में महिलाएं बंधन के बेड़ियों को अपने साहस से तोड़ रही है। हर क्षेत्र में स्त्रियां पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है। कुछ क्षेत्र में तो पुरूषों को कबके पछाड़ चुकी है। किंतु दुर्भाग्यवश हमारे समाज में स्त्री को भोग वस्तु के रुप में अभी भी समझा जा रहा है। तकनीक के ग़लत इस्तेमाल से यह समाज में और खुलकर सामने आ रही है। शायद इसी का परिणाम है कि आए दिन रोज़ कोई न कोई महिला, पुरूषों के हवस का शिकार होती है। एक महिला रात में घर से बाहर निकलने से घबराती है। वह सोचने के लिए मजबूर हो जाती है कि उसके महिला होने की वजह से वह वापस घर आ पाएगी कि नहीं। हाल ही में हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर जो अपने क्लीनिक बंद करके स्कूटी से घर आ रही थी कि रास्ते में स्कूटी की टायर पेंचर हो गई। और वह महिला थी सिर्फ इसलिए फिर कभी घर वापस घर ना आ सकीं। ज़रा सोचिए अगर उसी स्थान पर एक पुरुष होते तो क्या उसके साथ भी वैसा ही सलूक किया जाता?
हमें लगता है कि समाज औपचारिक शिक्षा, अच्छी किताबों, समान्य समृद्धि से बदल जाएगा। कल्हण, इब्न खाल्दून, मार्क ब्लाॅख, टैगोर, महात्मा गांधी, डॉ अम्बेडकर सबको यही लगता था। लेकिन इसकी गति बहुत धीमी है। समाज में बदलाव के लिए शिक्षा और समान्य बुद्धि के साथ-साथ जागरूकता भी अहम है। जागरूकता से ही बदलाव में गति आएगी। दरअसल बलात्कार के मूल में सेक्स नहीं है, हिंसा है। वरना इतनी बड़ी संख्या में वेश्याओं के सुलभ होने के बावजूद बलात्कार के लिए विनियम प्रक्रिया है। बलात्कार क्यों होते हैं? इस विषय पर भी सोचना होगा और पूरे देश में युद्ध स्तर पर जागरूकता फैलाना होगा।
----------------- रहमत

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