जब कभी मेरे जेहन में दलित शब्द का जिक्र आता है तो अनायास ही हमारे मस्तिष्क में डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जीवन की संघर्ष गाथा का स्मरण हो जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ अम्बेडकर ने ही दलितों के अधिकारों की वक़ालत की है बल्कि डॉ अम्बेडकर से पूर्व भी महान समाज सुधारक हुए हैं जैसे ज्योतिराव फूले का नाम अविष्मरणीय है। उन्होंने भी भारतीय सामाजिक संरचना में बदलाव लाने का प्रयास किया किन्तु इनके प्रयास उतने सार्थक सिद्ध नहीं हुए जितने डॉ अम्बेडकर के हुए। बाबा साहब दलितों को सामाजिक संरचना में बराबरी का स्थान सुनिश्चित करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में व्यवस्था की राज्य के अधीन किसी भी व्यक्ति से धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जायेगा। प्रस्तुत इस लेख के माध्यम से मैं वर्तमान समय में व्याप्त दलित मनोदशा के सन्दर्भ में पक्ष रखूंगा। यहां नाना प्रकार के प्रश्न है। अम्बेडकर ने दलितों के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक विकास का जो स्वप्नं देखा था। आखिर कितना पूरा हुआ? वर्तमान समय में दलितों की मनोदशा के प्रति उत्तरदायी कौन है? इन्हीं सवालों के जवाब दलितों की वर्तमान दशा के माध्यम से देने का प्रयास रहेगा।
यदि हम दलितों की मौजुदा सामाजिक स्थिति को अवलोकन करें तो पाएंगे कि देश की स्वतंत्रता के पश्चात भी सात दशकों से उनके साथ वहीं जातीय भेदभाव हो रहा है। जैसा कि स्वतंत्रता के पूर्व हो रहा था। मौजूदा समय के ग्रामीण भारत में सामाजिक संरचना में निम्न स्थान रखने वाले दलितों की बस्ती गांव के कोने में होती है। इनकी सामाजिक समानता के पैरवी के अग्रदूत डॉ अम्बेडकर ने शिक्षा के महत्व पर काफी प्रकाश डाला। उन्होंने इसी संदर्भ में कहा था कि "चाहे एक रोटी कम खाओ लेकिन अपने बच्चों को जरूर पढ़ाओ।"
वर्तमान समय में दलितों की तालीम (शिक्षा) की जो तश्वीर है वह अत्यंत निराशाजनक है। गौरतलब है कि आज़ादी के इतने दशक पश्चात कुल दलित आबादी के लगभग तीस फीसदी लोग शिक्षित हुए हैं। इसके अतिरिक्त शेष आबादी आज भी शिक्षा के महत्व व इसकी सार्थकता को लेकर जागरूक नहीं है। दलित समुदाय के लोग अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा तो दिलाते हैं लेकिन जैसे ही उनका पुत्र किशोरावस्था में पहुंचता है तो उनके माता-पिता उससे अपेक्षा करते हैं कि वह अपने परिवार को आर्थिक सहयोग प्रदान करें। कई बार तो ऐसा होता है कि बच्चा बीच में ही पढ़ाई छोड़ देता है। आखिर इस मनोदशा का जिम्मेदार कौन है? इस मनोदशा को यदि टटोल कर देखें तो पाएंगे कि उस दशा के लिए कहीं न कहीं हमारी शिक्षा की गुणवत्ता प्रणाली उत्तरदायी है। इसमें भी सबसे बड़ा कारण शिक्षा का निजीकरण व व्यवसायीकरण है। सुविधा संपन्न वर्ग के बच्चे ही निजी स्कूलों में शिक्षा अर्जित कर सकते हैं। यही वर्ग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने नहीं भेजते हैं क्योंकि वहां अपने बच्चों को पढ़ने से बेहतर भविष्य की कल्पना नहीं करते। इस प्रकार की धारणा समाज में व्याप्त है। जिसको निर्धन दलित समुदायों ने स्वीकारा भी है। दलित अपने आर्थिक स्थिति के कारण निजी विद्यालय में अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेज पाता है। जिससे ये अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजते हैं। इन विद्यालयों में पढ़ाने से अपने बच्चों का भविष्य नज़र नहीं आता है और धीरे-धीरे इनका शिक्षा से मोहभंग होने लगता है। और घर के खर्चे चलाने हेतु अपने बच्चों को कंपनी में दिहाड़ी मजदूरी में लगा देता है।
यदि हम दलितों के शिक्षित तबके पर गौर करें तो पाते हैं कि ये लोग अच्छी तालीम अर्जित कर अच्छे स्थान पर पहुंच जाते हैं। तो अपने समुदाय के लोगों से रूबरू होना बंद कर देते हैं। इसे लेखक ओम प्रकाश बाल्मीकि ने "दलित पूंजीवाद" की संज्ञा दी है। यही आगे चलकर अपने समूह का सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक रूप से उत्पीड़न करते हैं। और अपना एक अलग से वर्ग स्थापित करते हैं। इस सब के पीछे जो महत्वपूर्ण कारण है। वह है संस्कृतिकरण। समाजशास्त्री श्री निवास ने संस्कृतिकरण की बहुत ही सटीक परिभाषा दी है।_"जब उच्च जाति का अनुसरण करके निम्न जाति अपने सामाजिक स्तर का ऊँचा उठाने का प्रयास करती है।" इस प्रकार का संस्कृतिकरण वर्तमान समय में हो रहा है जैसे दलित दूल्हे का घोड़ी पर चढ़ाना। इस प्रकार देखें, तो हम पाते हैं, कि दलित वर्ग की निर्धनता के लिए केवल सार्वजनिक और निजीकरण के बीच ही अतंर्द्वंद नहीं है, बल्कि इनकी आर्थिक दशा भी जिम्मेदार है। बहुत हद तक इनकी सामाजिक सहयोग की शिथिलता भी है। ये जो सामाजिक शिथिलता है वह अचानक नहीं आयी बल्कि इस सामाजिक शिथिलता का कारण इन्हीं के बीच में विद्यमान तथाकथित उच्च अन्तर वर्ग भी है।
डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि दलित समुदाय को यदि निरंतर सामाजिक उत्थान करना है तो उन्हे राजनीति में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाना पड़ेगा। वर्तमान समय में इस परिपेक्ष्य पर गौर करें तो पाते हैं कि दलित प्रतिनिधित्व राजनीतिक शून्यता की ओर अग्रसर है। इस स्थिति के लिए स्वयं को दलित हितैषी बताने वाले बड़े राजनेता है। वे स्वयं को लंबे समय तक राजनीतिक स्वार्थपरक महत्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु, दलितों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भावना को दबा देते हैं। यदि कोई दलित राजनीति में नेतृत्व करने का प्रयत्न करता है तो बड़े-बड़े दलित राजनेता इस पनप रहे नेतृत्व को ही नेस्तनाबूद करने में लग जाते हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि अब दलित राजनेताओं पर भरोसा कायम करना छोड़ते जा रहे है। निरंतर राजनीतिक शून्यता की ओर अग्रसर दलित राजनीति चिंताजनक विषय होता जा रहा है।
निष्कर्षत: वर्तमान दलित मनोदशा को देखते हुए कह सकते हैं कि डॉ: अम्बेडकर ने जो दलित उत्थान का स्वप्नं संजोया था। वो वर्तमान में वास्तविकता से अत्यंत दूर है। आजादी के सात दशकों बाद भी दलितों कि दशा में बहुत अधिक सुधार नहीं आया है। इसके लिए जातिप्रथा और शिक्षा प्रणाली तो उत्तरदायी है ही साथ ही साथ दलितों के भीतर है उपजा तथाकथित दलित पूंजीवादी वर्ग भी स्पष्ट रूप से उत्तरदायी है। इस प्रकार: यदि ये निरंतर यथावत क्रियान्वयन होता रहा तो हम लोग कभी अम्बेडकर के समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व पर आधारित समाज का निर्माण नहीं कर पाएंगे।
अमित कुमार
एम.ए. (इतिहास) प्रथम वर्ष
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

बहुत अच्छा लेख है।
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