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Showing posts from May, 2020

प्रवासी मजदूर प्रवास क्यों करते हैं

कोरोनावायरस के कारण प्रवासी बिहारी मजदूरों की स्थिति- कोरोनावायरस एक वैश्विक महामारी है। पूरा देश इससे परेशान है। इससे बचने के लिए देशभर में लाॅकडाउन चल रहा है। यह एक प्रकार का आपातकाल ही है, जिसे लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर उठाया गया है। लाॅकडाउन के सहारे समाजिक दूरी बनाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि कोरोनावायरस को हराया जा सकें। लेकिन इसका पूरे देश पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है, देश की अर्थव्यवस्था डगमगा गई है। विकास की रफ़्तार रूक सी गई है। सारी फैक्ट्रियां बंद है, इससे सबसे ज्यादा प्रभावित प्रवासी बिहारी मजदूर हुए हैं। उनकी स्थिति कुछ ऐसी है कि जहां काम करते हैं वहां इस दौरान रहें तो बिना खाए मर जाएंगे। बिहारी मजदूर प्रावस के लिए क्यों मजबूर हैं आइए समझते हैं। ग्रामीण इलाकों का कृषि आधार वहाँ रहने वाले सभी लोगों को रोज़गार प्रदान नहीं करता है। क्षेत्रीय विकास में असमानता लोगों को ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में स्थानांतरित होने के लिये मजबूर करती है। शैक्षणिक सुविधाओं की कमी के कारण विशेष रूप से उच्च शिक्षा प्राप्त लोग इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये लिये ग्रामीण लोगों क...

मां पर दो कविता

ग़ज़ल मां के प्यार में कोई मिलावट नहीं होती है, इसलिए रिश्ता-ए-मुकद्दस कहलाती है मां।  जिंदगी में कायनात की हर खुशी मिल जाए, अपने बच्चों के लिए ऐसे बाहें फैलाती है मां। गुर्बत में जब घर में नहीं हो कुछ भी, तब भी अपने बच्चों को बहला लेती है मां। कभी गुनाह हो जाती है अपने बच्चों से, लेके जमानत रज़ा-ए-पाक की आ जाती है मां। जब अपने से कहीं दूर परेशानी में फंस जाते हैं बच्चे, आंसुओं को पोंछने ख्वाब में आ जाती है मां.. सफा-ए-हस्ती पे लिखती है उसूल-ए-जिंदगी, इसलिए तो मक़सद-ए-इस्लाम कहलाती है मां।। माँ माँ............, ये संसार कहता है तुझसे प्यारा, नहीं कोई इस दुनियां में। ये कहता है तुझ जैसा, कोई नही इस दुनियां में। माँ.........., तेरे आगे वो परवर-दिगार भी झुकता है, जिसके आगे सबका सिर झुकता है। तेरे साये पर ही सारा जग चलता है, जिसमें उसका भी साथ होता है। जब तू रूठ जाती है तब ऐसा लगता है, जैसे सारा जग बंजर हो चला हो। जब खोली मैंने भी आँखे अपनी, देखा सच कहता है ये संसार सारा। तेरे ना होने से ये घर सूना लगता है, ऐसा लगता है जैसे घर की जन्नत, रूठ क...

कहानी बिहार की

आज बिहार एक ऐसी मोड़ पर खड़ा हैं जहां से उम्मीद और निराशा की दोनों राह जाती है।  पिछले कई दशकों से अगर बिहार दुर्दशा झेल रहा है, तो इसकी असल वजह बिहार में राजनीति है। राजनीति में राज हावी रहा है, नीति का हमेशा अभाव रहा है। राज के हावी होने से बिहार में पिछड़े जाति और अगड़े जाति की लड़ाई और जंगल राज दोनों ने अपने पैर मजबूती से जमा लिया है। और नीति के अभाव में बिहार आज आजादी के 70 साल बाद भी अति पिछड़े राज्यों में आता है।  बिहार की अर्थव्यवस्था के ढांचे पर नज़र डालें तो निसंदेह यह समझा जा सकता है कि यहां संसाधनों का गंभीर अभाव है और हर साल बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं इसे और पिछे धकेल देती है। बिहार को मुश्किलों से निकालने के लिए लागातार सहायता की जरूरत है।  जाहिर है कि सारा मामला केंद्र सरकार पर टिका हुआ है। केंद्र सरकार भी बिहार के प्रति उदासीन रहा है। परंतु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि बिहार के पास जो भी खुद का पैसा और संसाधन है वह किस तरह से खर्च किया जाए?  मतलब सारा मुद्दा आकर टिकता है 'शासन' पर। लेकिन दु:ख की बात यह है कि जिनके हाथ में सत्ता आती है, वे...