आज बिहार एक ऐसी मोड़ पर खड़ा हैं जहां से उम्मीद और निराशा की दोनों राह जाती है। पिछले कई दशकों से अगर बिहार दुर्दशा झेल रहा है, तो इसकी असल वजह बिहार में राजनीति है। राजनीति में राज हावी रहा है, नीति का हमेशा अभाव रहा है। राज के हावी होने से बिहार में पिछड़े जाति और अगड़े जाति की लड़ाई और जंगल राज दोनों ने अपने पैर मजबूती से जमा लिया है। और नीति के अभाव में बिहार आज आजादी के 70 साल बाद भी अति पिछड़े राज्यों में आता है।
बिहार की अर्थव्यवस्था के ढांचे पर नज़र डालें तो निसंदेह यह समझा जा सकता है कि यहां संसाधनों का गंभीर अभाव है और हर साल बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं इसे और पिछे धकेल देती है। बिहार को मुश्किलों से निकालने के लिए लागातार सहायता की जरूरत है। जाहिर है कि सारा मामला केंद्र सरकार पर टिका हुआ है। केंद्र सरकार भी बिहार के प्रति उदासीन रहा है। परंतु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि बिहार के पास जो भी खुद का पैसा और संसाधन है वह किस तरह से खर्च किया जाए? मतलब सारा मुद्दा आकर टिकता है 'शासन' पर। लेकिन दु:ख की बात यह है कि जिनके हाथ में सत्ता आती है, वे पूरी तरह से व्यवस्था पर कब्जा कर लेते हैं। कानून व्यवस्था को बेहद व्यवस्थित ढंग से अपने हितों के अनुकूल बनाया जाता है। सत्ताधारियों को अपने चुनावी हितों की फ़िक्र रहती है। इसी आधार पर संसाधनों का आवंटन होता है। जन सशक्तिकरण के कार्यक्रम अपने वोट बैंक तक ही सीमित रखते हैं।
इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि राज्य के विभाजन के बाद संसाधन समृद्ध क्षेत्र झारखंड के हिस्से चले जाने से बिहार को औद्योगिक राज्य बनने की संभावना से भी हाथ धोना पड़ा। सरकारी उपकरणों के राजनीतिकरण से राज्य में वंचन और ग़रीबी की समस्या विकराल बनती गई। भारत में सामाजिक-आर्थिक बाधाओं पर एक अध्ययन से पता चलता है कि सबसे बुरी हालत वाले 100 जिलों की सूची में बिहार के 38 जिलों में से 26 जिले इस सूची में शामिल है। 94,163 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में फैले इस राज्य में 2019 तक के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्या तकरीबन 12 करोड़ 23 लाख है। 43,822 रूपये के साथ इसकी प्रति व्यक्ति आय सभी राज्यों से सबसे निचले पायदान पर है। मोटा-मोटी कहें तो भारत के तकरीबन 10 फीसदी आबादी राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम प्रति व्यक्ति आय पर जिंदगी बिताने पर मजबूर हैं। इन आंकड़ों को थोड़ा और गहराई से परखते हैं। बिहार की राजधानी पटना में प्रति व्यक्ति औसत आय 63,063 रूपये है, जबकि मधेपुरा (8069 रूपये) सुपौल (8492 रुपये) श्योर (7092 रुपये) जैसे अति पिछड़े जिलों में राज्य के औसत आय के पांचवें हिस्से से भी कम है। बिहार में हर तीसरा व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे की जिंदगी गुजार रहा है। 2011 के जनगणना के अनुसार बिहार में साक्षरता दर 63.23 प्रतिशत है। जो राष्ट्रीय साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत से बहुत कम है। महिलाओं में साक्षरता दर 51.5 है। यानी हर बिहार में हर दूसरी महिला निरक्षर है। संसद की स्थायी समीति के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बीच में ही स्कूल छोड़ने वाला हर पांचवां बच्चा बिहार का है। इसके अलग बिहार में शिशु मृत्यु दर, कुपोषण, और मातृ मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे है।
बिहार में लगभग 88.71 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। इनमें से 65 फीसदी के पास अपनी जमीन नहीं है। बगैर जमीन वाला अन्य राज्यों में दिहाड़ी मजदूर करने के लिए प्रवास करते हैं। इनमें से अधिकतर दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई जैसे महानगर में झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। बिहार के हर सौ लोगों में महज दो व्यक्ति ही सरकार को टैक्स देते हैं। बिहार हर मायने में वंचन के नए रिकॉर्ड कायम कर रहा है।
बिहार की सारी राजनीतिक बातें चुनाव लड़ने-लड़ाने, हारने या जीतने तक सीमित रह गया है। यहां सिर्फ सत्ता नहीं, व्यवस्था परिवर्तन जरूरी है। इसके लिए कहानी को दुबारा लिखना होगा। इसके लिए राज्य के राजनीतिक तौर पर कमजोर हो चले संस्थानों को मजबूत बनाना होगा। यह एक सच्चाई है कि भारत की कहानी बिहार की कहानी के बिना पूरी नहीं हो सकती।
..................रहमत




Comments
Post a Comment
कृपया अपनी टिप्पणियां अवश्य दें।