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मां पर दो कविता

ग़ज़ल



मां के प्यार में कोई मिलावट नहीं होती है,
इसलिए रिश्ता-ए-मुकद्दस कहलाती है मां।

 जिंदगी में कायनात की हर खुशी मिल जाए,
अपने बच्चों के लिए ऐसे बाहें फैलाती है मां।

गुर्बत में जब घर में नहीं हो कुछ भी,
तब भी अपने बच्चों को बहला लेती है मां।

कभी गुनाह हो जाती है अपने बच्चों से,
लेके जमानत रज़ा-ए-पाक की आ जाती है मां।

जब अपने से कहीं दूर परेशानी में फंस जाते हैं बच्चे,
आंसुओं को पोंछने ख्वाब में आ जाती है मां..

सफा-ए-हस्ती पे लिखती है उसूल-ए-जिंदगी,
इसलिए तो मक़सद-ए-इस्लाम कहलाती है मां।।



माँ


माँ............,
ये संसार कहता है तुझसे प्यारा,
नहीं कोई इस दुनियां में।
ये कहता है तुझ जैसा,
कोई नही इस दुनियां में।
माँ..........,
तेरे आगे वो परवर-दिगार भी झुकता है,
जिसके आगे सबका सिर झुकता है।
तेरे साये पर ही सारा जग चलता है,
जिसमें उसका भी साथ होता है।
जब तू रूठ जाती है तब ऐसा लगता है,
जैसे सारा जग बंजर हो चला हो।
जब खोली मैंने भी आँखे अपनी,
देखा सच कहता है ये संसार सारा।
तेरे ना होने से ये घर सूना लगता है,
ऐसा लगता है जैसे घर की जन्नत,
रूठ कर कहीं दूर जा कर बैठ गयी हो।
माँ............,
जब तुझसे दूर होते हैं,
तो याद आती है तेरे हाथ के बने खाने की।
वो प्यार भरे हाथों से खाने का स्वाद,
नही मिलता है मुझे कहीं ओर।
याद आती है तेरी उस डांट की,
जिसमें कल का चमकता तारा दिखता था,
जिसकी चमक आज की ज़िन्दगी में दिखती है।
माँ...........,
तेरे साये ने पल-पल हमें संभाला है,
अपने ममता के आँचल में हमें दुलारा है।
संघर्ष करना, समाज में चलना, जीवन से लड़ना,
तूने ही हमें  अपने व्यवहार से सिखाया है।
माँ............,
जब तू बिठाती है बेटी को डोली में,
डाल उस पर अपने ममता का साया,
कर देती है उसको इस घर से रुख़सत।
वो बेटी भी जब माँ बनती है,
तब ओढ़ तेरे ममता का साया,
ऐसे ही चलाती है जीवन आगे का सारा।
माँ.............,
तेरे दुआओं का हाथ जब हमारे सर पर होता है,
तब वो पल बहुत खूबसूरत होता है।
तुम्हारे होठों से जब,
वो शहद भरे अल्फ़ाज़ निकलते हैं,
तब ऐसा लगता है जैसे,
वो ख़ुदा ही ज़मीं पर उतर आया हो।
माँ...........,
जब तू हमें छोड़ चली जाती है,
तब लगता है इस संसार ने भी,
अलविदा कह दिया हो हमसे।
माँ............,
तेरे ममता के आँचल में,
हमें रहना बहुत ज़रूरी है।
इस जग को चलाने में,
तेरा साया बहुत ज़रूरी है।


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