मुस्लिम महिलाओं के बारे में एक आम धारणा यह है कि मुस्लिम औरतों धर्म के बंदिशों में जकड़ी रहती है, ये अपने शौहर के गुलाम बनकर रहती है, बस बच्चा पैदा करने वाली मशीन होती है, इनके कोई अधिकार नहीं होते हैं। परंतु हकीकत यह है कि इस्लाम में महिलाओं को बड़े अधिकार दिए गए हैं। यह अलग बात है कि अशिक्षा और कठमुल्लाओं के बेतुके फरमान और फतवा से मुस्लिम औरतों के बारे में भ्रम पैदा होता है। पवित्र क़ुरआन में कहा गया है कि..‘‘हमने महिला और पुरुष दोनों को एक समान आत्मा दी है, दोनों की महत्ता एक समान है।’’ उम्मुल मोमिनीन हजरत खद़ीजा का व्यापार के क्षेत्र में खुद में एक बहुत बड़ा और सम्मानित नाम था। हजरत आयशा ने जंग में हिस्सा लिया था। हजरत बीबी फातिमा को तो महिलाओं की सरदार का लक़ब मिला हुआ है। तो क्या यह सब इस्लाम से बाहर की थीं? नहीं, बल्कि ये सभी पैगम्बर मोहम्मद साहब के बताए इस्लाम का अनुसरण करती थीं। लेकिन आज के मौलवी, कठमुल्लाओं और धर्म के नाम पर अपनी दुकान चमकाने वाले कट्टरपंथी इस्लाम की अपनी नई परिभाषा गढ़ दी है। आज़ मुस्लिम महिलाओं का मुखर होना कोई अचरज भरा नहीं है। सदियों से रीति-रि...
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