कवि हेमंत जी का एक पोस्ट पढ़ा था जिसमें उन्होंने बिहारी और दिहाड़ी के आपसी रिश्ते की मार्मिक व्यख्या की है, "पता नहीं, यह कैसी मानसिक अवस्था है कि... न्यूज वाला 'दिहाड़ी' बोलता है और मुझे 'बिहारी' सुनाई देता है। वैसे भी, व्यावहारिक रूप से दोनों प्रायः समानार्थी ही हैं। देश में जहां-जहां दिहाड़ी मजदूरों की जरूरत, वहां-वहां बिहारी मौजूद। आज...इस भीषण संकट के दौर में ये दिहाड़ी महानगरों के लोगों के गले की हड्डी बन गए हैं। न उगलते बन रहा है न निगलते।" पोस्ट में और भी बातें लिखी गईं है, किंतु यह पोस्ट पढ़ते हुए मुझे युवा कवि अरुणाभ की कविता 'वो स्साला बिहारी' की याद आती रही। पोस्ट और कविता आपस मे ओवरलैप होने लगी। आप भी यह बेहतरीन कविता पढ़ें- वो स्साला बिहारी अबे तेरी… और कॉलर पकड़ तीन-चार जड़ दिए जाते हैं मुंह पर इतने से नहीं तो बिहारी मादर… चोर, चीलड़, पॉकेटमार भौंसड़ी के… सुबह हो गई चाय ला तेरी भैण की झाडू-पोछा तेरी मां लगाएगी? जब भी मैं अपने लोगों के बीच से गुजरता हूं रोजाना सुनने को मिलती हैं कानों को हिला देने वाली गालियां...